
रीवा के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में पौधों की कई प्रजातियां या तो पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं या फिर विलुप्त होने के कगार पर है। वन विभाग को कई ऐसे पेड़ ढूंढे नहीं मिल रहे जो अब से एक दशक पहले तक दिखाई दे रहे थे। ढाक, कदम, जाल, जेंड, रौंज, गिरनी व शीशम जैसे हरे-भरे पेड़ अब बमुश्किल दिखाई देते हैं। विलुप्त हो रही कई प्रजातियां ऐसी हैं, जो पर्यावरण की दृष्टिकोण से काफी मायने रखती हैं। रौंज, जैंड, बड़ व धाक जैसे लंबे आकार वाले पौधे न होने की वजह से कई पक्षियों के बसेरों को अन्य जगह तलाशनी पड़ रही है। इसके अलावा ये पेड़ भी पीपल की तरह ही बड़ी मात्रा में आक्सीजन का स्त्रोत हैं, जिनसे आबोहवा संतुलित रहती है।
जिले में करीब 32 प्रकार के पेड़ संकट की श्रेणी में हैं. जंगलों में ये पेड़ विलुप्त होने की कगार पर आ गए हैं. जबकि इनमें से कई पेड़ों का औषधीय महत्व है.
पेड़ों की निम्न प्रजातियां संकट में…
*कर्कट, शल्यकर्णी, दहीमन और मैदा वृक्ष की प्रजातियां सबसे ज्यादा खतरे में है.
*धनकट, हडुआ, तमोली, चिरौंजी, सलई, धवा, हल्दु, अंजन, तिनसा, तिलवन, भिलमा, हर्रा, और भुड़कूट वृक्ष की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है.
*बीजा, गदहा, पलाश, लोध्र, गरुड़ और सोन पाठा प्रजातियों पर खतरा है
*इनमें रोहिना, काला शीशम, कुल्लू, जहरमोहरा, अधकपारी, कुंभी, गब्दी, केड़क प्रजातियां संवेदनशील श्रेणी में रखी गई है.
*पाकर, कुचला, उदाल, कुंवारिन के वृक्ष ऐसे हैं जिन्हें अभी से नहीं बचाया गया तो आने वाले सालों में संकट की श्रेणी में आ जाएंगे.
वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो पेड़ों की कई प्रजातियों के संकट में आने के लिए आम लोगों का प्रकृति से दूर होना भी एक अहम कारण है. आम लोग गिने-चुने 8 से 10 पेड़ों के अलावा दूसरी पेड़ों की प्रजातियां को नहीं पहचानते.आम जनमानस में जागरूकता की कमी है।वन विभाग जिले में विलुप्त होते पेड़ों की इन प्रजातियों को बचाने के लिए पौधे रोपने में लगा हुआ है. इन प्रजातियों के पौधे रीवा वन विभाग नर्सरी(रोपणी) में बड़ी संख्या में तैयार कराए जाते हैं.साथ ही लोगों से इन्हें लगाने की भी अपील की जाती है।समय समय पर वन विभाग द्वारा जिले के सरकारी एवम निजी संस्थानों में पौधारोपण के वृहद कार्यक्रम आयोजित किए जाते है,साथ ही नागरिकों को पौधारोपण करने हेतु निःशुल्क पौधे भी वितरित किए जाते है।तेजी से विलुप्त हो रही हैं पेड़ों की प्रजातियां।वन विभाग,जिला प्रशासन एवम हम सभी को महत्वपूर्ण पेड़ों की उन स्थानिय प्रजातियों को बचाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो तेजी से लुप्त होती जा रही हैं। इनसे धरती की पहचान है। धरती पर मौजूद पेड़ों की करीब 60 हजार विविध प्रजातियां पृथ्वी के बायोमास का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। ये पृथ्वी के वन आवरण के वितरण,संयोजन और संरचना को नियंत्रित करने के अलावा पारिस्थितिकी सेवाएं भी मुहैया कराते हैं। पृथ्वी की जैव विविधता के विकास के साथ-साथ पेड़, जीवों व वनस्पतियों को आवास उपलब्ध कराने और भोजन, ईंधन, लकड़ी, औषधीय उत्पादों व अन्य चीजों के जरिए जीवन व आजीविका को बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।धरती की संवहनीयता को बनाए रखने में पेड़ों के महत्व को लेकर काफी जागरुकता के बाद भी इनकी विविधता, वितरण और संरक्षण की स्थिति को लेकर लंबे समय से हैरान कर देने वाली दूरी बनी हुई है। गैर-उत्पादक प्रजातियों के स्थान पर तेजी से बढ़ने और ज्यादा मार्केट वैल्यू वाले पेड़ों को बढ़ावा मिलने से वनों के कम होने की दर तेज हो गई है। विविधता और वितरण में बदलाव से जलवायु परिवर्तन पर भी असर पड़ता है। पेड़ों की कटाई से एल्बिडो और कार्बन डाईऑक्साइड सांद्रता में बढ़ोतरी होती है, वाष्पीकरण में कमी के कारण मौसम शुष्क और गर्म होता है,जिससे जैव विविधता व खाद्य उत्पादन में कमी आती है और मरुस्थलीकरण और ग्लेशियरों के पिघलने की दर तेज होती है।जिले में जड़ी-बूटी और अन्य वन औषधियों की भरमार है। लेकिन इनका संरक्षण व संवर्धन नहीं होने की वजह से ये गुणकारी पेड़ अब विलुप्त होने के कागार पर है। गांवों की बसावट और सड़कों के विस्तार के कारण पिछले एक दशक में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के चलते जिले में औषधीय वृक्ष की 20 से ज्यादा दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है।
विलुप्त हो रहे ये औषधीय पेड़….
20-22 साल पहले जिले के विभिन्न गांवों में गम्हार, खैर, पलाश, हर्रा, बहेरा, सतावर, कोचिला, अर्जुन सहित अनेक औषधि पेड़-पौधों की भरमार थी। इनमें हर औषधीय पौधे की अपनी-अपनी अलग विशेषता है। बैकुंठपुर प्रखंड में खैरा और गम्हारी दाे ऐसे गांव हैं जहां इन औषधीय पेड़ों की भरमार थी। खैर की प्रचुरता के कारण खैरा और गम्हार की अधिकता के कारण गांव का नाम गम्हारी पड़ा। लेकिन इन दोनों गांवों से भी ऐसे मूल्यवान औषधीय वृक्ष संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रहे हैं। कुछ जगहों पर गिने-चुने पेड़ ही रह गए हैं। इसके संरक्षण के लिए न तो समाज के लोगों ने पहल की और न ही प्रशासन ने।पेड़ों की कटाई से भूमिगत जलस्तर भी घट रहा है।औषधीय पेड़ों की कटाई से बीमारियां बढ़ी है। तापमान बढ़ रहा है। गर्मी के सीजन में तापमान 47 डिग्री के पार भी पहुंच जाता हैं। बेमौसम बरसात होती हैं। जिससे फसलों को भी नुकसान होता हैं। अतिवृष्टि या औसत से कम बारिश होना भी इसका एक कारण हैं। इसका असर जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ रहा है।
विलुप्त हो रहे पौधो का क्या है कारण!
विलुप्त हो रहे पौधे का प्रमुख कारण गिरता भू जल स्तर और लगातार बढ़ रहे दीमक का प्रकोप है। विभाग का कहना है कि जहां पहले भू जल स्तर दस फीट था,वहीं आज यह बढ़कर 70 फीट पर जा पहुंचा है। बढ़ते दीमक का प्रकोप भी एक प्रमुख कारण है। पेड़ की जड़ में दीमक लग जाने से कई पौधे सूख रहे हैं। पेड़ों की प्रजातियों के लिए प्रमुख खतरों में वनों की कटाई, आवास को क्षति, लकड़ी और गैर-लकड़ी उत्पादों के लिए अत्यधिक दोहन, कृषि गतिविधियां और विदेशी कीटों और बीमारियों का प्रसार शामिल हैं। अत्यधिक दोहन ने जिले के कुल वन क्षेत्र को काफी हद तक बदल दिया है। दुर्भाग्य से बहुत से लोग पेड़ों को “पैसे कमाने की मशीन” के रूप में देखने लगे हैं।
संरक्षण के लिए क्या कर रहा वन विभाग!
पौधे की प्रजातियों को बचाने के लिए वन विभाग पूरी तरह प्रयास में जुटा हुआ है।जिन पौधों की प्रजाति मिल रही है उन्हें फिर से पौधारोपण किया जा रहा है।जिले की वन रोपणी(नर्सरी) में पौधारोपण के लिए बड़ी संख्या में पौधे तैयार किए जा रहे है।विभाग का कहना है कि पौधारोपण के दौरान दीमक से बचाने के लिए दवा का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अन्य मौसम में भी पेड़ों को बचाने के लिए सभी बेहतर उपाय किए जा रहे हैं।बसंत का मौसम पौधारोपण हेतु सबसे अच्छा मौसम है।पेड़ पौधों और उनके रोपण हेतु आमजनमानस को जागरूक किया जा रहा है।
लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने पर ध्यान केंद्रित हो…
अब समय आ चुका है कि हम और अधिक प्रजातियों को विलुप्त होने से रोकें और बिगड़े हुए पारितंत्रों को फिर से बहाल करें। प्रभावी संरक्षण कार्यों के लिए पर्यावरण के लिए समर्पित नीतिगत ढांचे की आवश्यकता होती है।वनवासियों को अपना दायरा बढ़ाना चाहिए।महज सामान्य प्रजातियों के वृक्षारोपण से आगे बढ़कर वनीकरण और पुनर्जनन गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए दुर्लभ, संकटग्रस्त स्थानिय प्रजातियों को विलुप्त होने से रोकने और उनके उत्थान को बढ़ावा देने का काम करना चाहिए।इस तरह की कार्रवाई न केवल जैव विविधता संकट के संरक्षण में मदद करेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करेगी।
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