सरकार नौकरी की उम्मीद देती है… नौकरी नहीं देती… बल्कि जान लेती है..- विंध्य के पांच दशक में 6 बड़े हादसों में 322 लोगों ने जिंदगी गवाई है। विंध्य में बसों की जल समाधि के काले अध्याय में बीता मंगलवार एक पन्ना और जुड़ गया ,विगत पांच दशक में रीवा संभाग 6 बड़े बस हादसे हो चुके हैं जिसमें 322 लोगों की जान जा चुकी है, इसके बावजूद शासन प्रशासन ने सबक नहीं लिया। विंध्य में ज्यादातर बड़े बस हादसे किसी ना किसी त्योहार के दिन हुए, अब 16 फरवरी को बसंत पंचमी के दिन यह दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ। आपको एक बार वह काले दिन बता दें जिस दिन अपनों ने अपनों को खोया और त्यौहार का उत्साह गम में बदला,- 1973 सतना जिले का लीलजी बांध जिसमे बस डूबी और 97 लोगों की मौत हुई -2000 बनास नदी सीधी जिले में 30 लोगों की मौत हुई -2006 गोविंदगढ़ तालाब रीवा62 लोगों की जल समाधि हुई- 2007 कचनी पुलिया सिंगरौली 40 व्यक्तियों की जान चली गई- दो हजार अट्ठारह सोन नदी पुल सीधी 22 लोगों की जान चली गई- सीधी जिले में ही 17 अप्रैल 2018 को सोन नदी के जोगदहा पुल हादसे में ट्रक में सवार 22 बारातियों की मौत हो गई थी, बारातियों को लेकर मिनिट्रक सिंगरौली जिले के झखरवाल गांव से बाकी जा रहा था। ट्रक सोन नदी के जोगदहा पुल के पास अनियंत्रित होकर 10 फीट नीचे पानी में जा गिरा जिसमे ट्रक में सवार 22 लोगों की मौत हो गई थी। एक बार फिर पुरानी यादों को ताजा कर दिया 16 फरवरी का दिन जब 51 लोगों की जान चली गई।
वालों की बहन के लिएमंगलवार को हुए हादसे मेंविभा प्रजापति क्या वो खुद को जिंदगी भर माफ कर पायेगी…क्या इस दोष से मुक्त हो पाएगी की अगर वो नौकरी के लिए परीक्षा देने न जा रही होती तो आज उसका छोटा भाई जिंदा होता। वही छोटा भाई जो रक्षाबंधन को उसकी रक्षा का वचन देकर राखी बंधवाता था। यह वचन ही तो था जो दूसरे जिले अनजानी जगह जा रही बहन को अकेले न भेज सुबह तड़के से उसके साथ निकल गया था। वचन भी तो पूरा किया उसने अपनी जान देकर… हाथ पकड़ी बहन को डूबती बस के गेट से बाहर फेंक खुद को डूब जाने दिया… उस भाई ने अपना वचन जान देकर निभाया… लेकिन सरकार…. अगर सरकार अपना वचन निभा रही होती तो ये 51 लोग जिंदा होते। मैं सरकार.से कहना चाहती हु अगर हर जिले में ऑन लाइन परीक्षा के एक आयन सेंटर या परीक्षा केंद्र तुमने खोले होते तो ये जिंदा होते।मुख्यमंत्री जी आपने अपने दो मंत्री भेजे थे। मातमी चेहरे में बयान दे रहे थे मेरे माइक में। तब भी घटना पर कम खुद को भेजे जाने का एहसान जनता पर लादने की कोशिश कर सरकारी दर्द बांट रहे थे। मैं पूछ रही हूं … दर्द तो उन्हें हुआ होगा जिनकी बेटी ने अपने मासूम के साथ पानी मे तड़प-तड़प कर दम तोड़ी है, जिनके घरों के चिराग बुझ गए हैं। उस दर्द को तुम क्या समझोगे जो एक मां ने तब महसूस किया होगा जब वो गर्भ में पल रहे शिशु के साथ असमय जलसमाधि को जा रही थी। करोड़ो करोड़ के बजट का ढिंढोरा आप सड़क के नाम पर पीटते हो लेकिन आज भी तुम्हारी घाटियां चलने लायक नहीं हैं। क्योंकि आपके थैलों को भरने वाली फैक्ट्रियों के लौह दानवो ने सडकों की धज्जियां उड़ा दी है जिससे बचने लोग रास्ते बदल रहे। मुख्यमंत्री जी … अगर तुम्हारे भेजे दूत सही संदेश देंगे तो तुम खुद को उन बैगों का जिम्मेदार पाओगे जिसमे अब कभी टिफिन और किताबें नही रखी जाएंगी क्योंकि ऐसा करने वाले उनके मालिक दुनियां जो छोड़ गए।मैं तो सोच रही हूं कि आपको नींद कैसे आती होगी सरकार.. इतनी मौतों का बोझ अपने सर लेकर… या आपका दिल भी पत्थर है और जुबान सिर्फ दिखावा करती है… तो सुनिए मुख्यमंत्री जी इन मौतों का जवाब आप को देना होगा… उस बहन की आह आप से सवाल करती रहेगी… इन मौतों के जिम्मेदार -सिर्फ और सिर्फ तुम हो सरकार.।